धर्मग्रंथो से शिक्षा

एक समय एक बहुत महात्मा और ज्ञानी पुरुष थे। वह प्रायः अपने शिष्यों को रामायण, महाभारत और नीति ग्रंथो की अच्छी बातें बताकर उन्हें आचरण में उतारने का आग्रह करते थे। वह रोज़ संध्या करके प्रवचन करते और श्रावकों को इन धर्मग्रंथों की कथाएं एवं दृष्टान्त सुनाकर उनको सद्गुणी बनाने का प्रयास करते थे। महात्मा जी भी स्वयं तदनुकूल व्यवहार करते थे। वह स्वयं कंदमूल फल खाते थे और किसी चीज़ की इच्छा न करते थे। धन संचित करने में उनकी कदापि रूचि न थी। प्रवचन के बाद महात्मा जी लोगो के प्रश्नो और जिज्ञासाओं का भी समाधान करते थे। एक दिन प्रवचन के बाद एक व्यक्ति ने प्रश्न किया कि रामायण को सही माना जाये या गलत ? तब महात्मा जी ने उत्तर दिया ,”वत्स ! जब रामायण की रचना हुई थी, तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। जब रामचंद्र जी वन में विचरण कर रहे थे तब भी मेरा अता पता नहीं था, इसीलिए मैं ये नहीं बता सकता की ये सही है या गलत। मैं तो सिर्फ इतना बता सकता हूँ कि इसके अध्ययन और इससे मिलने वाली शिक्षा से सुधारकर मैं आज इस स्थिति में हूँ, चाहो तो तुम भी इन शिक्षाओं का प्रयोग कर अपना जीवन सुधार सकते हो।”

शिक्षा : धर्मग्रन्थ या नीतिग्रंथ तर्क का विषय नहीं होते। उनके अस्तित्त्व पे बहस करने से अच्छा है की उनकी शिक्षाओं को हम अपने जीवन में उतारें ताकि हम अपना जीवन सुधार सकें।

बदलाव की सोच : An Idea of Change

एक बार प्रसिद्द ब्राज़ीलियन लेखक पाउलो कोएलो (Paulo Coelho) एक रेलवे स्टेशन पर खड़े हुए अपने पब्लिशर के आने का इंतज़ार कर रहे थे। तभी उनकी नज़र रेल की पटरियों पर पड़ी , जहाँ कुछ मजदूर लोग मरम्मत का काम कर रहे थे।  तभी उनके मष्तिष्क में एक विचार आया।  उन्होंने पास खड़े मजदूर में से एक पूछा की ,”इन पटरियों के बीच कितनी दूरी होगी?” मजदूर ने जवाब दिया १४३.५ सेंटी मीटर।
पाउलो को यह दूरी कुछ अजीब सी लगी की न तो यह १४५ से.मी. है न  १४४ से. मी. और न ही १५० से.मी. तो आखिर १४३.५ से.मी. ही क्यों? उन्होंने मजदूर से फिर पूछा कि यह दूरी इतनी ही क्यों? इस पर मजदूर ने कहा , क्यूंकि रेल के पहियों के बीच की दूरी इतनी ही होती है। इस पर पाउलो बोले ,” क्या तुम्हे नहीं लगता की इस दूरी की वजह से रेल के पहियों के बीच की दूरी इतनी है?” इस बात पर स्टेशन वर्कर मुस्कुराया और बोला ,”चीजें ऐसी इसीलिए हैं , क्यूंकि वे ऐसी ही हैं। ”
परन्तु यह जवाब पाउलो की जिज्ञासा को ख़तम नहीं कर सका। एक टाइम पास सवाल उनकी जिज्ञासा बन चुका था। उन्होंने खूब सारी पुस्तकें पढ़ डालीं हज़ारो पन्ने भी पलटे। अंततः उनको जवाब कुछ ऐसा मिला-जब पहली ट्रैन बनी तो उन्ही टूल्स (औज़ारों ) से बानी, जिनसे उस समय में दूसरी गाड़ियां या बग्गियां आदि बनाई जाती थीं और उन गाड़ियों के पहियों के बीच की दूरी १४३.५ से.मी. होती थी।
वह दूरी इसीलिए रखी गयी थी , क्यूंकि पुरानी सड़कें इसी पैमाने के हिसाब से बनती थीं और यह माप दिया था सड़कें बनाने वाले रोमन लोगो ने। इस माप की वजह थी – युद्ध में प्रयोग होने वाली घोडागाड़ियाँ। दरअसल , अगल – बगल में दौड़ने वाले घोड़े एक दूसरे एक बीच इतनी ही दूरी लेते थे। संभवतः इस दूरी को बहुत पहले किसी रोमन एक्सपर्ट ने नापा हो और उसके सौभाग्य से यह माप मानक माप बन गयी, जिसका आज पूरी दुनिया पालन करती है।
इस दूरी ने शायद कोई बाधा न उत्पन्न की हो , इसीलिए हर कोई इसे अपनाता गया और शायद इसीलिए कभी भी इसे बदलने की कोशिश भी नहीं की गयी , और यदि कभी किसी ने इसे बदलने की कोशिश की भी होगी तो इस पंक्ति ने उसे हरा दिया होगा – यह दूरी इतनी ही होती है और ये ही सही है।

शिक्षा : यद्यपि सभी के जीवन के पथ तय होते हैं परन्तु देश, काल और परिस्थतियों के अनुसार जीवन की बहुत सारी बातें/चीजें बदलाव चाहती हैं , लेकिन हमारी ये सोच कि आज तक ऐसा ही होता आया है बहुत सारी परेशानियां खड़ी कर देती हैं या फिर हमें एक ही तरीके की जीवन जीने पर मजबूर कर देती है।
किसी भी अच्छे बदलाव के लिए चाहिए हिम्मत – अच्छा सोचने की और उस सोच पर अमल करने की।

बुद्धत्व की प्राप्ति : Attainment of Inner Peace

एक सम्राट था जो मुर्गो की लड़ाई की वार्षिक प्रतियोगिता में अपने मुर्गे को भी भेजना चाहता था। तो उसने एक बहुत बड़े झेन फ़क़ीर को बुलाया।  उस फ़क़ीर की बड़ी प्रसिद्धि थी उसे युद्ध में कोई हरा नहीं सकता।  हराना  तो दूर , उसके पास आकर लोग हारने के लिए उत्सुक हो जाते थे और उस से हार कर प्रसन्न हो कर लौटते थे।  उस फ़क़ीर से हार जाने की बात बहुत गौरव की बात समझी जाती थी।  तो सम्राट ने सोचा की यह फ़क़ीर यदि मेरे मुर्गे को प्रतियोगिता के लिए त्यार कर दें।

फ़क़ीर को बुलाया गया। फ़क़ीर मुर्गे को साथ ले गया। तीन हफ्ते बाद सम्राट ने पुछवाया , मुर्गा तैयार है? फ़क़ीर ने कहा अभी नहीं।  अभी तो दूसरे मुर्गे को देख कर वह सर खड़ा कर के आवाज देता है। सम्राट को थोड़ी हैरानी हुई कि यह तो सही लक्षण है क्यूंकि यदि लड़ना है तो सर खड़ा करके आवाज न देगा तो दूसरे मुर्गे को डरायेगा कैसे ?

खैर, कुछ और दिन प्रतीक्षा की गयी।  सम्राट ने फिर पुछवाया।  फ़क़ीर ने फिर न में जवाब दिया। फ़क़ीर बोलै की उसकी पुरानी आदत तो जा चुकी , लेकिन अभी भी अगर दूसरा मुर्गा आता है तो तन क खड़ा हो जाता है , अकड़ में आ जाता है। फिर और तीन हफ्ते बीत गए। सम्राट ने फिर पुछवाया। फ़क़ीर ने कहा अब थोड़ा थोड़ा तैयार है, लेकिन अभी थोड़ा वक़्त और लगेगा।  अभी भी दूसरा मुर्गा कमरे में आ जाये तो खड़ा तो रहता है , लेकिन अंदर ही अंदर व्यथित हो जाता है , तनावग्रस्त हो जाता है।

फिर एक दिन फ़क़ीर ने कहलवाया कि अब मुर्गा पूरी तरह से तैयार है।  अब वह ऐसे खड़ा रहता की जैसे कोई आया ही न हो , या कोई गया ही न हो।  और अब कोई फ़िक्र या तनाव नहीं।  सम्राट चिंता में पड़ गया कि अब यह जीतेगा कैसे??

फ़क़ीर ने कहा तुम चिंता मत करो , अब हारने की कोई सम्भावना ही नहीं रही। दूसरे मुर्गे इसे देखते ही भाग खड़े होंगे।  इसे लड़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।  इसकी उपस्तिथि ही काफी है।

प्रतियोगिता के दिन हुआ भी ऐसा ही। मुर्गे को प्रतियोगिता के लिए खड़ा किया गया तो दूसरे मुर्गो ने उसे सिर्फ झांक कर देखा , लेकिन उस मुर्गे ने जवाब में कोई आवाज नहीं दी , क्यूंकि यदि वो जवाब में आवाज देता तो ये उसके भय और कमजोरी के लक्षणों को प्रदर्शित करता।  भय को छिपाने के लिए ही कोई मुर्गा जोर से कुकड़-कू बोलता है वह डराना चाहता है, लेकिन अंदर से स्वयं डरा हुआ होता है।

तो उस मुर्गे ने न आवाज दी, और न ही किसी और मुर्गे को देखा।  जैसे कुत्ते भौंकते रह जाते हैं और हठी गुजर जाता है , ऐसे ही वह मुर्गा भी खड़ा रहा , जैसे कोई पत्थर की मूर्ति हो।  दूसरे मुर्गो ने देखा तो उनकी कंपकपी छूट गयी क्यूंकि यह तो बहुत अजीब था दूसरे मुर्गो जैसा नहीं है  , जरूर कोई बात है तो इसके पास जाना खतरे से खाली नहीं , तो अन्य मुर्गे सब भाग खड़े हुए प्रतियोगिता में उतर नहीं सके। इस प्रकार सम्राट के शांत मुर्गे की जीत हुई।

शिक्षा : सम्राट के शांत मुर्गे की भाँती ही हमे भी इतना ही शांत होना चाहिए की यदि कोई हम पर क्रोध करता हो या हमसे लड़ना भी चाहे तो हम पर उसके क्रोध का कोई प्रभाव न दिखे हम उसके उत्तर में क्रोध न दिखाएं।  इसी प्रकार एक अच्छे मनुष्य को व्यर्थ का क्रोध नहीं करना चाहिए , और न ही तनावग्रस्त होना चाहिए , अपने अंदर इतनी शांति उत्पन्न कर लें जैसे बुद्धत्व को पा  लिया हो।

संसाधनों का उपयोग…

भगवान् बुद्ध के  एक शिष्य  ने कहा , ” प्रभु ! मुझे आपसे एक निवेदन करना है .”

बुद्ध: बताओ क्या कहना है ?

शिष्य : मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं . अब ये पहनने लायक नहीं रहे . कृपया मुझे नए वस्त्र दें  !

बुद्ध ने अनुयायी के वस्त्र देखे , वे सचमुच बिलकुल जीर्ण हो चुके थे और जगह जगह से घिस चुके थे …इसलिए उन्होंने एक अन्य अनुयायी को नए वस्त्र देने का आदेश दे दिए.

कुछ दिनों बाद बुद्ध उस शिष्य के घर पहुंचे .

बुद्ध : क्या तुम अपने नए वस्त्रों में आराम से हो ? तुम्हे और कुछ तो नहीं चाहिए ?

शिष्य : धन्यवाद प्रभु . मैं इन वस्त्रों में बिलकुल आराम से हूँ और मुझे और कुछ नहीं चाहिए .

बुद्ध: अब जबकि तुम्हारे पास नए वस्त्र हैं तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया ?

शिष्य : मैं अब उसे ओढने के लिए प्रयोग कर रहा हूँ ?

बुद्ध: तो तुमने अपनी पुरानी ओढ़नी का क्या किया ?

शिष्य : जी मैंने उसे खिड़की पर पर्दे की जगह लगा दिया है

बुद्ध: तो क्या तुमने पुराने पर्दे  फ़ेंक दिए ?

शिष्य : जी नहीं , मैंने उसके चार टुकड़े किये और उनका प्रयोग रसोई में गरम पतीलों को आग से उतारने के लिए कर रहा हूँ.

बुद्ध: तो फिर रसोई के पुराने कपड़ों का क्या किया ?

शिष्य : अब मैं उन्हें पोछा लगाने के लिए प्रयोग करूँगा .

बुद्ध: तो तुम्हारा पुराना पोछा क्या हुआ ?

शिष्य : प्रभु वो अब इतना तार -तार हो चुका था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था , इसलिए मैंने उसका एक -एक धागा अलग कर दिए की बातियाँ तैयार कर लीं ….उन्ही में से एक कल रात आपके कक्ष में प्रकाशित था .

बुद्ध शिष्य से संतुष्ट हो गए . वो प्रसन्न थे कि उनका शिष्य वस्तुओं को बर्वाद नहीं करता और उसमे समझ है कि उनका उपयोग किस तरह से किया जा सकता है।

शिक्षा : आज जब हमारे प्राकृतिक संसाधन दिन – प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं ऐसे में हमें भी कोशिश करनी चाहिए कि चीजों को बर्वाद ना करें और अपने छोटे छोटे प्रयत्नों से इस धरा को सुरक्षित बना कर रखें।